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हमारा देश में हैरान कर देने वाले मंद‍िरों की लंबी ल‍िस्‍ट है।ऐसा नही है कि इस तरच कि जगहे भारी देशोमे नही है पर भारतत इस तरह कि  आश्चर्यकारक जगहो के लिये जाना जात है ।
जैसे कि अष्ट विनायक मंदिरोमेसे पाली के बल्लालेश्वर मंदिर मी हर साल माघ गणेश जन्मकि रात साक्षात गणेशजी भोजनप्रसाद ग्रहण करते है ।मैने स्वयं इसाक अनुभव 10 साल सतत किया है।पुणे के पास  भुलेश्वर के महादेव भी इसी तरह प्रसाद ग्रहण करते है।
अमरनाथ मे बर्फ का शिवलिंग तैय्यार होता है और माहिनेभर रहता है। इस दौरा साक्षात शिवाजी का निवास वाह होता है औसा वर जाश्यप ऋषीजिको मिला है
(पढीये अमरनाथजिकी इतिहास गंगा
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कन्याकुमारीके पास शुचिंदर मे इंद्रदेव रोज रात महादेव का पूजन करते है ,मथुरा मे आजभी रास लीला खेली जाती है,तथा राधा रानी रोज उनकी मंदिरमे शृंगार करणे आती है।

इसी तरच महड के अष्टविनायक गणेशजी के द्वार 24 घंटे खुले होते है।हम  कई बार मुंबईसे कोई भी यात्रा ,जैसे अष्टविबायक यात्रा ,या भीमाशंकर ,देहू आळंदी यात्रा या ,दक्षिण महाराष्ट्र कि यात्रा के लिये बाय रोड निकलते है तो देर रातको महड के दर्शन करके आगे जाते है।
उज्जैन के कालभैरवजी मदिरा प्राशन करते है।इसितरह उज्जैन के महाकाल मंदिरमे स्थित नाग चंद्रेश्वर मंदिर के पट साल के सिर्फ एक दिन नाग पंचमी के दिन खुलते है।

क‍िसी मंद‍िर में स्‍थाप‍ित मूर्ति चक‍ित कर देती है तो कहीं मंद‍िर की बनावट। लेक‍िन आज मै ,शिवंजय संजय ज‍िस मंद‍िर के बारे में लेखणे हा रहा हु । वह मंद‍िर वर्ष के 364 द‍िनों तक बंद रहता है और केवल एक द‍िन ही खुलता है वह भी रक्षाबंधन के ही द‍िन।  आइए जानते हैं क‍ि क्‍या है इस मंद‍िर के वर्ष भर बंद रहने का रहस्‍य और आख‍िर राखी के द‍िन ही क्‍यों खुलता है यह मंद‍िर?

देवर्षि नारद करते हैं वर्ष के 364 द‍िनों तक पूजा
हम ज‍िस मंद‍िर के बारे में आपको बता रहे हैं वह उत्‍तराखंड के चमोली ज‍िले में स्थित है। इस मंद‍िर का नाम वंशी नारायण मंद‍िर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडव काल में हुआ था। यूं तो यह मंद‍िर पूरे वर्ष बंद रहता है लेक‍िन रक्षाबंधन के द‍िन जरूर खुलता है। हालांक‍ि उस द‍िन भी केवल सूरज ढलने से पहले तक ही पूजा-अर्चना क‍िये जाने का न‍ियम है। मान्यता है कि इस मंदिर में देवर्षि नारद 364 दिन नारायणजी की पूजा अर्चना करते हैं और यहां पर मनुष्यों को पूजा करने का अधिकार सिर्फ एक दिन के लिए ही है।

मंद‍िर को लेकर म‍िलती है ऐसी कथा:
कत्‍यूरी शैली में बने 10 फिट ऊंचे इस मंदिर का गर्भगृह भी वर्गाकार है। यहां भगवान विष्णु चर्तुभुज रूप में विद्यमान हैं। मंद‍िर में स्‍थाप‍ित प्रत‍िमा में भगवान व‍िष्‍णु और भोलेनाथ के एक साथ दर्शन होते है। मनुष्यों को इस मंदिर में एक दिन पूजा करने का अधिकार देने के पीछे भी बहुत महत्वपूर्ण कथा है। पौराण‍िक कथा के अनुसार एक बार राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वह उनके द्वारपाल बनें। भगवान विष्णु ने राजा बलि के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और वह राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए।

जब भगवान व‍िष्‍णु को लेकर परेशान हुईं देवी लक्ष्‍मी:

भगवान विष्णु के कई दिनों तक दर्शन न होने कारण माता लक्ष्मी परेशान हो गई और वह नारद मुनि के पास गई। नारद मुनि के पास पहुंचकर उन्होंने माता लक्ष्मी से पूछा के भगवान विष्णु कहां पर है। जिसके बाद नारद मुनि ने माता लक्ष्मी को बताया कि वह पाताल लोक में हैं और द्वारपाल बने हुए हैं। तब माता लक्ष्‍मी अत्‍यंत परेशान हो गईं और उन्‍होंने नारद मुनि ने भगवान विष्णु को वापस लाने का उपाय पूछा।

श्रावण मास की पूर्णिमा इसल‍िए है मंद‍िर के ल‍िए व‍िशेष:

माता लक्ष्‍मी के भगवान व‍िष्‍णु को वापस लाने का मार्ग पूछने पर देवर्षि ने कहा क‍ि हे माता आप श्रावण मास की पूर्णिमा को पाताल लोक में जाएं और राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दें। इसके बाद राजा बलि से भगवान व‍िष्‍णु को वापस मांग लें। इसपर माता लक्ष्मी ने कहा कि मुझे पाताल लोक जाने का रास्ता नहीं पता क्या आप मेरे साथ पाताल लोक चलेंगे। इस पर उन्होंने माता लक्ष्मी के आग्रह को स्वीकार कर लिया और वह उनके साथ पाताल लोक चले गए।
तब देवर्षि के साथ माता लक्ष्‍मी पहुंची पाताल लोक
कथा के अनुसार नारद मुन‍ि के माता लक्ष्‍मी के साथ पाताल लोक जाने के बाद कलगोठ गांव के जार पुजारी ने वंशी नारायण की पूजा की तब से ही यह परंपरा चली आ रही है। रक्षाबंधन के दिन कलगोठ गांव के प्रत्येक घर से भगवान नारायण के लिए मक्खन आता है। इसी मक्खन से प्रसाद तैयार होता है। इस मंदिर में श्रावन पूर्णिमा पर भगवान नारायण का श्रृंगार भी होता है। इसके बाद गांव के लोग भगवान नारायण को रक्षासूत्र बांधते हैं। साथ ही सभी के कल्‍याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
याहा पे  ऐसी मान्यता है कि इस दिन राखी बांधने वालेकी विष्णू भगवान स्वयं रक्षा करते है।
यः मंदिर चमोली जिल्हा उत्तराखंड के हेलंग नामक गावसे जाणवले रस्ते कि उर्गम घाटी मे  है।
इसी उर्गम घाटी मे पंच केदार मेसे एक "कल्पनाथ " केदार के दर्शन होते है ।
मै शिवंहाय संजय    दो बार कल्पनाथ केदार यात्रा कर आय हु। बहुत हि सुंदर जग है ।
रास्ता थोडा कठीन है । इसी रस्ते मे पंच बदरी मेसे बुढे बद्री /वृद्ध  बद्री के दर्शन भी होते है।
यह वृद्ध बद्री का मंदिर पंच बद्री मेसे तीसरे
बद्री खलाटे है।
याहा नार्दजी ने टॉप्स किया था और उन्हे बद्री बाथजीने यह एक वरीधं रूप मी दर्शन दिये थे ,इसलीये इसे वृद्ध बद्री के बाम सि जाणं जाता है ।
मुझ पामर पे सद्गुरू कि इतनी करून कृपा है कि कुछ भी  तरहकी   साधना ,ज्ञान ,साधन ,ताकत ( शारीरिक ,सामाजिक ,मानसिक,आर्थिक ,टाकत का अभाव होते हुए भी) मुझसे नाही सिर्फ 12 ज्योतिर्लिंग सेवा दर्शन 35 बार करवाये गये ( 12 ज्योतिर्लिंग के एक दर्शन 25000 km का सफर  किया जात है),ऊस दर्शनके अनुसान्गसे सप्त नदिया ,सप्त मोक्ष धाम,क्षणमुग्म के छह स्थान, पंच केदार ,पंच प्रयाग,चार धाम( चार दिशा के ,उत्तरांखाब्द के ,बीडश जे ,वाबाजी के ,सातयुगी दत्त भगवान के ,कलियुग दत्त के ,आदी शंकराचार्यकें,)नवं नंदी ,पंचराम शिवके ,एकादश रुद्रस्थान,के साथ साथ पंच बद्रीजिकी सेवा दर्शन प्राप्त करणे का सौभाग्य ,वो उभी अपनी सारी जिम्मेड्रिया ,घर ,नोकरी संबंगाकते करवाये गये।किटने कृपाळू है मेरे आदी गुरु जिन्होने या हा सब  जरते करते अच्छे लीग ,साधक ,छात्र ,पंडित,माता भगिनी  साथ ले जाने का  अवसर भी प्राप्त करावया।
यह वाशी नारायण मंदिर 12000 फिट कि उंचाई पुर स्थित है ।उसकी एक और विशेषता है कि इस मंदिरमे स्थापित विष्णू भगवान के मुरते मी हि शिरूप भी दिखता है ।
मै दो बार यहा पे जा चुका हु।
ऐसे आबेक आश्चर्य कारक मंदिरोंके दर्शन प्राप्त होणे का अवसर निळा ताठ इंपे कॅच्च लिहाकर चाचक नारायण को ओरस्तुत जाणें कि आशा भी  प्राप्त हुई है और वाचक नारायण मेरे लेखन जा आबांड भ प्रॉत जरते गाई ,ऐसा कि साधक ,वाचक नारायण स्वयं तथा फोन या लुखकार बटाटे है उससे स्फूर्ती ,आनंद मिळतात तो है प्र और लिझबे कि प्रेरणा भी मिलती है।
ऐसेही हरबार नई यात्रा स्थानो का परीक्षण प्रस्तुतिका अवसर बार बार प्राप्त हो कर वाचकनारायण  सेवा  होवे यही सद्गुरू चरणोन्मे प्रार्थना।
  इदं न मम।
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मराठीत
फक्त श्रावण राखी पोर्णिमेसच एक दिवस उघडे राहणारे मंदिर:$#¡v@π√∆¥ dr $@π√∆¥

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drsanjayhonkalse.blogspot.com।                ।शिवसंकल्पनस्तु।
आपल्या भारतात आश्चर्यकारक मंदिरांची एक लांबलचक मालिकाच आहे.असे नाही कि अशी  ठिकाणे इतर देशात नाहीत, पण भारत अशा आश्चर्यकारक ठिकाणांसाठी प्रसिद्ध आहे,।
जसे अष्ट विनायक मंदिरे, पालीचे बल्लाळेश्वर मंदिर,तीथे माघ गणेश जन्म  दिनी गणेशजी स्वतः भोजनप्रसाद ग्रहण करण्यास येतात.
मी शिवं जय संजय बेस्वतः 10 वर्षे सतत याचा अनुभव घेतला आहे.पुण्याजवळील भुलेश्वरचे मदेफेव देखील त्याच प्रकारे  प्रसाद घेतातहाही अनुभव आहेच.

अमरनाथच्या  येथे बर्फाचे शिवलिंग तयार होते  व नाहीना भर तेथे शिव निवास असतो अअसा कश्यप ऋषींना हजारो वर्षांपूर्वी वर आहे आहे.
वाचा "अँरनाथची इतिहास गंगा:दर संजय होनकळसे
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कन्याकुमारीजवळअसलेल्या शुचिन्द्रम शिव मंदिरात भगवान इंद्रदेव दररोज रात्री महादेवाची पूजा करतात.

तशाच प्रकारे महाडच्या अष्टविनायक गणेशजींचे दरवाजे चोवीस तास उघडे असतात आम्ही नेहमी जर रास्ता मार्गे दक्षिण महाराष्ट्रात यात्रेस जातो तेंव्हा  रात्री 12 वाजता महड दर्शन करूनच पुढे जात असतो.
उज्जैनचे काळभैरवजी मदिरा प्राशन करतात.तसेच उज्जैनच्या महाकाल मंदिरात असलेल्या नाग चंद्रेश्वर मंदिराचे दरवाजे नाग पंचमीला वर्षाच्या फक्त एका दिवशी उघडले जातात.

  अशा रीतीने कधी मंदिरात स्थापित केलेली मूर्ती आश्चर्यचकित करते,काही ठिकाणी  मंदिराची रचना.  पण आज, ज्या मंदिराबद्दल मी शिवंजय संजय लिहित आहे,
ते मंदिर वर्षातील 364 दिवस बंद राहते आणि फक्त एका दिवशी खुले असते तेही रक्षाबंधनाच्या दिवशी.  हे मंदिर वर्षभर बंद असण्याचे रहस्य काय आहे ते शिवं जय संजय द्वारा जाणून घेऊया आणि शेवटी हे पाहुयात कि  मंदिर फक्त राखीच्या दिवशीच का उघडते?

येथे देवर्षी नारद वर्षातील 364 दिवस पूजा करतात:
मी शिवंजय संजय तुम्हाला ज्या मंदिराबद्दल सांगत आहे ते उत्तराखंडच्या चमोली जिल्ह्यात आहे.  या मंदिराचे नाव वंशी नारायण मंदिर आहे.  पौराणिक मान्यतेनुसार हे मंदिर पांडव काळात बांधले गेले.  हे मंदिर वर्षभर बंद असले तरी ते रक्षाबंधनाच्या दिवशी नक्कीच उघडते.  तथापि, त्या दिवशी देखील, सूर्य अस्तापर्यंत प्रार्थना करण्याचा नियम आहे.  असे मानले जाते की या मंदिरात देवर्षी नारद 364 दिवस नारायणजींची पूजा करतात आणि येथे मानवांना फक्त एका दिवसासाठी पूजा करण्याचा अधिकार आहे.

मंदिराबद्दल अशी एक कथा आहे:
कात्युरी शैलीत बांधलेल्या 10 फूट उंचीच्या या मंदिराचे गर्भगृहही चौरस आहे.  येथे भगवान विष्णू चतुर्भुज स्वरूपात उपस्थित आहेत.  मंदिरात स्थापित मूर्तीमध्ये भगवान विष्णू आणि भोलेनाथ एकत्र दिसतात.  मानवांना एक दिवस या मंदिरात पूजा करण्याचा अधिकार देण्यामागे एक अतिशय महत्वाची कथा आहे.  पौराणिक कथेनुसार, एकदा राजा बलीने भगवान विष्णूला आपला द्वारपाल बनण्याची विनंती केली.  भगवान विष्णूने राजा बलीची ही विनंती मान्य केली आणि तो राजा बलीबरोबर पाताळला गेला.

जेव्हा देवी लक्ष्मी भगवान विष्णूबद्दल नाराज झाली:

अनेक दिवस भगवान विष्णूला न पाहल्यामुळे माता लक्ष्मी नाराज झाली आणि नारद मुनींकडे गेली.  नारद मुनीजवळ पोहोचल्यावर त्यांनी नारद यास  विचारले की भगवान विष्णू कुठे आहेत?  त्यानंतर नारद मुनींनी माता लक्ष्मीला सांगितले की ती अधोलोकात आहे आणि द्वारपाल आहे.  मग माता लक्ष्मी खूप अस्वस्थ झाली आणि तिने नारद मुनींना भगवान विष्णूला परत आणण्याचा मार्ग विचारला.

म्हणूनच श्रावण महिन्यातील पौर्णिमा मंदिरासाठी खास आहे:

देवी लक्ष्मीला भगवान विष्णूला परत आणण्याचा मार्ग विचारल्यावर देवर्षी म्हणाले की श्रावण महिन्याच्या पौर्णिमेला तुम्ही पाताळात जाऊन राजा बळीच्या मनगटावर रक्षासूत्र बांधा.  यानंतर, राजा बलीला विष्णूला परत करण्यास सांगा.  यावर माता लक्ष्मी म्हणाली की मला तेथला जाण्याचा रस्ता माहित नाही, तुम्ही माझ्याबरोबर पाटाळलोकात याल का?  यावर त्याने माता लक्ष्मीची विनंती मान्य केली आणि तो तिच्याबरोबर ते  गेले.

  मग माता लक्ष्मी देवर्षींसोबत पाताळ गाठल.
पौराणिक कथेनुसार, नारद मुनी देवी लक्ष्मीसोबत पाताळात गेल्यानंतर, कालगोठ गावातील जार पुजारी वंशी नारायण यांची पूजा केली, तेव्हापासून ही परंपरा चालू आहे.  रक्षाबंधनाच्या दिवशी भगवान नारायणांसाठी काळगोठ गावातील प्रत्येक घरातून लोणी येते.  या लोण्यापासून प्रसाद तयार केला जातो.  श्रावण पौर्णिमेला या मंदिरात भगवान नारायणचा मेकअपही केला जातो.  यानंतर गावातील लोक भगवान नारायणांना रक्षासूत्र बांधतात.  तसेच सर्वांचे कल्याण आणि सुख आणि समृद्धीसाठी प्रार्थना करतात
येथे अशी श्रद्धा आहे की या दिवशी राखी बांधणाऱ्याचे भगवान विष्णू स्वतः रक्षण करतात.
हे मंदिर उत्तराखंडच्या चमोली जिल्ह्यातील हेलंग नावाच्या गावातून  रस्त्याच्या उरगाम खोऱ्यात जाणाऱ्या आहे.
  या उरगम खोऱ्यात पंच केदारांपैकी एक "कल्पनाथ" केदार  वास्तव्यास आहेत.
कल्पनाथ केदारचा प्रवास करून मी शिवं जय संजय  दोनदा  करून आलो.  खूप सुंदर व दैवी स्थान आहे.
रस्ता थोडा कच्चा आहे.  अशाप्रकारे, पंच बद्री पासून वृद्ध बद्री चे दर्शन देखील आहे.
हे वृद्धबद्री मंदिर पंच बद्रीचे तिसरे आहे.
बद्रीधाम आहे.
येथे नारदजींनी तप केले आणि  तत्यांना बद्री बाथजींनी वृद्ध स्वरूपात दर्शन दिले, म्हणूनच त्याला वृद्ध बद्रीचे धाम म्हणून ओळखले जाते.
म्या  पामरावर सद्गुरूंची इतकी दया आहे की कोणत्याही प्रकारची साधना, ज्ञान, साधन, शक्ती (शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, आर्थिक, शक्ती नसतानाही) वा लायकी नसतांना  केवळ 12 ज्योतिर्लिंग सेवा दर्शन मला 35 वेळा करवून थांबवले नाही (12 ज्योतिर्लिंग) 25000 किमीचे दर्शन केले जाते), तर तत्या अन्यसंगे, सप्त नादि, सप्त मोक्ष धाम, षणमुगाची सहा ठिकाणे, पंच केदार, पंच प्रयाग, चार धाम (चार दिशानिर्देश, उत्तराखंड,4 बुद्धधाम, 4 बाबाजीधाम, 4 सत्ययुगी दत्त भगवान, कलियुग दत्त धाम, 4 आदि शंकराचार्य धाम, नव नंदी, पंचराम शिवस्थाने, एकादश रुद्रस्थान, तसेच पंच बद्रीजिकी सेवा दर्शन घेण्याचे सौभाग्य सर्व जबाबदाऱ्या, घर, नोकरी पार पाडत करायला लावली गेली. आदि गुरु किती कृपावंत कि हे सर्व  सोबत चांगली माणसे, साधक, विद्यार्थी, पंडित, आई बहिणी,मित्र मैत्रिणी बरोबर  घेऊन जाण्याची पुण्यसंधी मिळाली.
हे वंशी नारायण मंदिर 12000 फूट उंचीवर आहे.या मंदिराचे आणखी एक वैशिष्ट्य म्हणजे या मंदिरात स्थापित भगवान विष्णूची मूर्तीत शिरूप देखील दृश्यमान आहे.
मी इथे दोनदा आलो आहे.
अशा आश्चर्यकारक मंदिरांचे दर्शन घेण्याची अशी एक अद्भुत संधीतर मिळालीच पण हे व अनेक यात्रानुभव लिहिब्याची संधीही प्राप्त झाली. व वाचक बारायनांनी माझी लखन सेवा आवडीने  उचलून धरली
, अनेक साधक, वाचक नारायण स्वतः वा  फोन किंवा लिहून तसे शेअर केले आहेज्यामुळे उर्जा , आनंद, वाटून  लिहिण्याची  प्रेरणा देखील मिळते.
अशा  ठिकाणांची चाचणीनिहाय लेेेखन करून  वाचकनारायण सेवा वारंवर घडो
   हीच सद्गुरू चरणी प्रार्थना.
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