जहां भागीरथी गंगा बनती है।:देव प्रयाग

अगस्तै नमः।कृन्वंतो विश्वम् आर्यम्।।
देव प्रयाग :जहां भागीरथी गंगा  बनती है।
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          ..शिव संकल्पमस्तु ..
गंगा दशहरा उस दिन शुरू होता है जब गंगा शिवजी के माध्यम से पृथ्वी पर उतरती है। इसका स्रोत गौमुख कहलाता है। यह गंगोत्री से लगभग 19 किमी ऊपर चढ़कर प्राप्त किया जाता है। यहा जाने, रहने, रहने का अनुभव अनुभूती  शिवंजय संजय नाम के  इस शरीर ने  दो बार अनुभव किया है।
इस संगम का मनमोहक रूप मन ही मनमें मैं ४० बार   केदारनाथ और बद्रीनाथ यात्रा मार्ग में भर लेट था और उसने अब मन मी स्थायी जगह बनाली है ।  देव प्रयाग  स्नान शायद 8 से 10 बार किया हु क्योंकि यह एक पहाड़ी सड़क है और सरकारी बस या जीप से यात्रा करने कि वजहसे  हमेशा यह उतरना संभव नहीं होता है .  संगमप्र गंगा का पानी हरा है और अलकनंदा कबूतर रंग है। संगम के दौरान दोनों रंग स्पष्ट रूप से भिन्न होते हैं और थोड़ा आगे जाने पर गंगा नीली हरी हो जाती है
मजे की बात यह है कि संगम में भागीरथी मछली को संगम के बहुत करीब देखा जा सकता है, लेकिन अलक नंदा में नहीं।
गंगा की मछलियां खाने में बहुत मीठी होती हैं।  मीठे पानी की डॉल्फ़िन भी हैं।
एक और मजेदार बात यह है कि कौवे यहां कहीं नजर नहीं आते।
  देवप्रयाग अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित है।  यहां से दो नदियों का संयुक्त प्रवाह 'गंगा' कहलाता है।  यह टिहरी से 18 मील दक्षिण-दक्षिण पूर्व में है।  प्राचीन हिंदू मंदिरों के कारण इस तीर्थ स्थल का विशेष महत्व है।  संगम पर होने के कारण इसे तीर्थराज प्रयाग के नाम से भी जाना जाता है।
  .  यह स्थान उत्तराखंड राज्य के पंच प्रयागों में से एक माना जाता है।  इसके अलावा कहा जाता है कि जब राजा भागीरथी ने गंगा से धरती पर उतरने का आग्रह किया तो गंगा के साथ 33 करोड़ देवी-देवता भी स्वर्ग से अवतरित हुए।  इसके बाद वे गंगा के जन्मस्थान देवप्रयाग में रहने लगे।  भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यहां से पवित्र नदी गंगा निकली।  यहीं से पहली बार इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है।  इस अर्थ में यह गंगा का उद्गम स्थल है।

  गढ़वाल प्रांत की मान्यताओं के अनुसार भागीरथी नदी को सासु और अलकनंदा नदी को सून कहा जाता है।  गंगा नदी अकेले गौमुख से देव प्रयाग तक बहती है लेकिन सरस्वती (केशवप्रयाग), धौली गंगा (विष्णु प्रयाग) अलकनंदा बद्री नाथ कंदील सतोपंथ से निकलती है
  नंदाकिनी (नंद प्रयाग), पिंडारी (करण प्रयाग) और मंदाकिनी (रुद्रप्रयाग) के साथ खेलते हुए। इसलिए पहाड़ी लोग उन्हें बहू कहते हैं। और बगगीरथी सास की तरह दिखती हैं, इसलिए उन्हें सास माना जाता है। - यहाँ कानून।
और संगम को यहा  ही सास-बहू का मिलन कहा जाता है

देवप्रयाग भारत के उत्तराखण्ड राज्य में स्थित एक नगर एवं प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यह अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को पहली बार 'गंगा' के नाम से जाना जाता है। यहाँ श्री रघुनाथ जी का मंदिर है, जहाँ हिंदू तीर्थयात्री भारत के कोने कोने से आते हैं। देवप्रयाग अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर बसा है। यहीं से दोनों नदियों की सम्मिलित धारा 'गंगा' कहलाती है। यह टेहरी से १८ मील दक्षिण-दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। प्राचीन हिंदू मंदिर के कारण इस तीर्थस्थान का विशेष महत्व है। संगम पर होने के कारण तीर्थराज प्रयाग की भाँति ही इसका भी नामकरण हुआ है

देवप्रयाग समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है और निकटवर्ती शहर ऋषिकेश से सड़क मार्ग द्वारा ७० किमी० पर है। यह स्थान उत्तराखण्ड राज्य के पंच प्रयागों में से एक माना जाता है। इसके अलावा इसके बारे में कहा जाता है कि जब राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने को राजी कर लिया तो ३३ करोड़ देवी-देवता भी गंगा के साथ स्वर्ग से उतरे। तब उन्होंने अपना आवास देवप्रयाग में बनाया जो गंगा की जन्म भूमि है। भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यही से पवित्र नदी गंगा का उद्भव हुआ है। यहीं पहली बार यह नदी गंगा के नाम से जानी जाती है।
गढ़वाल क्षेत्र में मान्यतानुसार भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। यहां के मुख्य आकर्षण में संगम के अलावा एक शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैं जिनमें रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण है। यहां का सौन्दर्य अद्वितीय है। निकटवर्ती डंडा नागराज मंदिर और चंद्रवदनी मंदिर भी दर्शनीय हैं। देवप्रयाग को 'सुदर्शन क्षेत्र' भी कहा जाता है। यहां कौवे दिखायी नहीं देते, जो की एक आश्चर्य की बात है।

मान्यतानुसार यहां देवशर्मा नामक एक तपस्वी ने कड़ी तपस्या की थी, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम देवप्रयाग पड़ा। प्रयाग किसी भी संगम को कहा जाता है।यह स्व.आचार्य श्री पं.चक्रधर जोशी नामक ज्योतिष्विद एवं खगोलशास्त्री का गृहस्थान था, जिन्होंने १९४६ में नकषत्र वेधशाला की स्थापना की थी। ये वेधशाला दशरथांचल नामक एक निकटस्थ पर्वत पर स्थित है। यह वेधशाला दो बड़ी दूरबीनों (टेलीस्कोप) से सुसज्जित है और यहां खगोलशास्त्र संबंधी पुस्तकों का बड़ा भंडार है। इसके अलावा यहां देश के विभिन्न भागों से १६७७ ई से अब तक की संग्रह की हुई ३००० विभिन्न संबंधित पांडुलिपियां सहेजी हुई हैं। आधुनिक उपकरणों के अलावा यहां अनेक प्राचीन उपकरण जैसे सूर्य घटी, जल घटी एवं ध्रुव घटी जैसे अनेक यंत्र व उपकरण हैं जो इस क्षेत्र में प्राचीन भारतीय प्रगति व ज्ञान की द्योतक हैं।
रामायण में लंका विजय उपरांत भगवान राम के वापस लौटने पर जब एक धोबी ने माता सीता की पवित्रता पर संदेह किया, तो उन्होंने सीताजी का त्याग करने का मन बनाया और लक्ष्मण जी को सीताजी को वन में छोड़ आने को कहा। तब लक्ष्मण जी सीता जी को उत्तराखण्ड देवभूमि के ऋर्षिकेश से आगे तपोवन में छोड़कर चले गये। जिस स्थान पर लक्ष्मण जी ने सीता को विदा किया था वह स्थान देव प्रयाग के निकट ही ४ किलोमीटर आगे पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। तब से इस गांव का नाम सीता विदा पड़ गया और निकट ही सीताजी ने अपने आवास हेतु कुटिया बनायी थी, जिसे अब सीता कुटी या सीता सैंण भी कहा जाता है। यहां के लोग काला न्तर में इस स्थान को छोड़कर यहां से काफी ऊपर जाकर बस गये और यहां के बावुलकर लोग सीता जी की मूर्ति को अपने गांव मुछियाली ले गये। वहां पर सीता जी का मंदिर बनाकर आज भी पूजा पाठ होता है। बास में सीता जी यहाम से बाल्मीकि ऋर्षि के आश्रम आधुनिक कोट महादेव चली गईं। त्रेतायुग में रावण भ्राता ओं का वध करने के पश्चात कुछ वर्ष अयोध्या में राज्य करके राम ब्रह्म हत्या के दोष निवारणार्थ सीता जी, लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग में अलकनन्दा भागीरथी के संगम पर तपस्या करने आये थे। इसका उल्लेख केदारखण्ड में आता है।उसके अनुसार जहां गंगा जी का अलकनन्दा से संगम हुआ है और सीता-लक्ष्मण सहित श्री रामचन्द्र जी निवास करते हैं। देवप्रयाग के उस तीर्थ के समान न तो कोई तीर्थ हुआ और न होगा। इसमें दशरथात्मज रामचन्द्र जी का लक्ष्मण सहित देवप्रयाग आने का उल्लेख भी मिलता हैतथा रामचन्द्र जी के देवप्रयाग आने और विश्वेश्वर लिंग की स्थापना करने का उल्लेख है।
देवप्रयाग से आगे श्रीनगर में रामचन्द्र जी द्वारा प्रतिदिन सहस्त्र कमल पुष्पों से कमलेश्वर महादेव जी की पूजा करने का वर्णन आता है। रामायण में सीता जी के दूसरे वनवास के समय में रामचन्द्र जी के आदेशानुसार लक्ष्मण द्वारा सीता जी को ऋषियों के तपोवन में छोड़ आने का वर्णन मिलता है।
वैसे भी कम से कम एक बार ऐसे अनोखे, बहुत आकर्षक और स्वर्गीय स्थान पर जाएं और जिनके पास गोमुख जाने की क्षमता नहीं है और गंगा के स्रोत पर अपने पुराने रिश्तेदारों को खुशी देकर पुण्य संचय को बढ़ाते हैं।
इदं न मम।
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