हिंदी:कट्टर्गम्मा, बाबाजी क्रिया योग दीक्षा स्थान।
अगस्तै नमः।कृन्वंतो विश्वम् आर्यम्।।'
कट्टार्गम्मा, बाबाजी क्रिया योग दीक्षा स्थान।
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।शिवसंकल्पमस्तु।
सद्गुरु कृपा से,मैंने अमरनाथ (3 बार) से अनंतपुर (पद्मनाभ स्वामी - कन्या कुमारी रामेश्वरम 39 बार) तक भारत के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों का यात्रा दौरा किया है। असम अरुणाचल प्रदेश से सोमनाथ, द्वारका पुरी 39 बार ,पंच केदार, पंच बद्री , पंच प्रयाग,पंच राम,नवनंदी,एका दश रुद्रस्थान,छह क्षणमुखस्थान, एक ओम पर्वत,अष्टनारायण,अष्ट विनायक,कोंकण अष्टगणेश,33 पितृ स्थान,40 शक्तिपीठ,कई सिद्ध पीठ दर्शन सेवा,गौमुख गंगासागर,परशुरामकुंड से कुत्रालम अगस्त्यकुंड एवंअगस्त्य प्रपात तक ले जाया गया हु।
योग्यता के अभाव में यह कृपा पात्र हुआ,तथा बाबाजीने तीन मराठी,हिंदी,अंग्रेजीभाषाओं में अपनी जीवनी पुस्तक लेखनसेवा कराली,जो शायद सारी दुनिया में उनका एकमात्र जीवनी चरित्र भंडार है।
तो बाबाजी चारधाम : जन्म ,गुरुस्थान ,शिक्षास्थान तथा साक्षात्कार तथा सिध्दपीठ सिद्धाश्रम पर्वतस्थान जे दर्शनभी हुए ,उनके जन्मस्थान तो 8 दस बार हो आया हु।
आइए आज एक नजर डालते हैं उस जगह पर जहां उन्होंने उनकी योग दीक्षा-शिक्षा हुई और पाते है वहां की जानकारी:
मई 2014 के बैसाख पुनमकी सुबह हम सात लोक कोलंबो एअर पोर्ट उतरे । यह यात्रा करने का मेरा उद्देश सिर्फ बाबाजींकि गुरुस्थली तथा क्रिया योग दीक्षा शिक्षा स्थली के चरनधुल माथे पे लगाना था,और विरीधाभास यह था कि यह स्थान हमारी Itinerary में शामिल नही था।
यह स्थान श्रीलंका के दक्षिण प्रांत के हंबनटोट में तीसमहाराम के पास है। यहाँ एक याला नामक राष्ट्रीय उद्यान है।
लेकिन मैं इस बिंदु तक आया और सचमुच मेरे 8 लोगों के समूह से दूर भाग गया जिनके लिए लंका यात्रा की व्यवस्था की गई थी।
यह भारत से बाहर मेरा पहला दौरा था (नेपाल को छोड़कर जहां मैं 5 बार गया था, एन कैलास)
मुझे कट्टिर ग्राम जाने में बहुत दिलचस्पी थी (लंकाई में कट्टार्गम्मम)
सबसे बड़ी कठिनाई, उच्चार,
भाषा ,परिवहन, सं संस्कृती ,मार्ग,इ.पार कर मैं कट्टिर ग्राम पहुंचा।
कल्पना कीजिए कि मैंने इसके लिए क्या दिव्य पार किया?
कटिर ग्राम का अर्थ है कार्तिक मास का गाँव।
यहां कार्तिक रुका और उसकी लीला उनकी प्रेमिका वल्ली के साथ हुई।
हम यहां मानते हैं कि कार्तिकेय अविवाहित थे (कुछ विश्वास / किंवदंती के कारण) लेकिन यह सच नहीं है, उनकी दो पत्नियां थीं देवसेना एवं वल्ली।
देवसेना देवताओं (देवों) के राजा इंद्र की पुत्री है। इंद्र ने कार्तिकेय से उसकी शादी कर दी, जब वह देवताओं का सेनापति बन गये। दक्षिण-भारतीय संस्कृती में, देवसेना को आम तौर पर उनकी सह-पत्नी वल्ली के विरोधी के रूप में दर्शाया गया है; एक साथ वे तिनो भगवान को पूरा करते हैं। देवसेना को आमतौर पर कार्तिकेय के साथ चित्रित किया जाता है और अक्सर वल्ली के साथ भी होता है।
देवसेना कि स्वतंत्र पूजा ,उपासनाका आनंद नहीं लिया जाता हैं, लेकिन उनकि अधिकांश मंदिरों में कार्तिकेय की पत्नी के रूप में पूजा की जाती है। वह तिरुप्परनकुंदरंम मुरुगन ,मदुराई मंदिर में एक बड़ी भूमिका निभाती है, जिसे उसकी शादी का स्थल माना जाता है।
लेकिन तारकासुर का वध करने के बाद कार्तिकेय श्री लंका के कटीरग्राम, तिसमारखा क्षेत्र में गए, जहां उनकी भेंट स्थानीय आदिवासी जनजाति के राजा राजा की बेटी कार्तिकी से हुई। यहीं पर कार्तिकेयन ने अपनी सारी तपस्या एवं लीलाये की थी
उसके साथ। वल्ली कृष्ण की राधा के साथ तुलनीय है।
यह यहाँ ८४ सिद्धों में से एक भोगनाथ, बाबाजी के प्रथम योग क्रिया गुरु रुके हुए थेंऔर अपना गुरुकुल चला रहे थें और उन्होने यहा श्री कार्तिकेय का स्वर्ण यंत्र स्थापित किया है।
आषाढ़ मास के दौरान यहां कार्तिकेयन का एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है हर साल जुलाई अगस्त दरम्यान।
महावतार बाबाजी अपने गुरु बोगरनाथ उर्फ भोगनाथ से मिलने के लिए भारत से पैदल चलकर यहां आए थे।
उन्होंने क्रिया योग की अपनी सारी औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर ली थी।
यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा, आकर्षण से भरा है। मैं यहासे अतुल्य अध्यात्मिक उर्जानंद लेकर रात 10 बजे वापस अपने ग्रुप पाहुचा।
कट्टीर ग्राम दर्शन वृत्तांत एक अलग लेखाआलेख का विषय है।
लेकिन एक बात यहा जोडनी आवश्यक है कि इस सेवा दर्शन दिव्य भेंट जे पश्चात सद्गुरुने मुझ middle कलास महाविद्यालयीन शिक्षकसे जिसने अपना सिखाने का विषय tution कि दृष्टिसे hot cake होते हुए भी कभिभी किसिकी tution नही ली,दुनियाके 40 देश पांच खंड यात्रा कराली।है न अजूबा!
मैं वास्तव में दो बार इस जगह का दौरा करने के लिए धन्य महसूस करता हूं।
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