मोदीजी के प्रसिद्धी पराङ्मुखं आध्यात्मिक गुरु।भाग 1


छोटी मूर्ति,महान किर्ती:
मोदीजी के प्रसिद्धी पराङ्मुखं आध्यात्मिक गुरु।भाग 1
"शिवांजय": डॉ। संजय होनकालसे
drsanjayhonkalse@gmail.com

मुझे अपने जीवन में कभी राजनीति में दिलचस्पी नहीं रही, आज भी नहीं है। मुझे याद है कि मुंबई विश्वविद्यालयसे एम.ए.में स्वर्णपदक प्राप्तीपश्चात,पोदार कॉलेज के प्राचार्य पीजे जोशीजीने मुझसें कई सवाल किए जैसे दुनिया में कौंनसी अर्थव्यवस्थाएं हैं? भारतके लिए किस तरहकी अर्थव्यवस्था सही है?मेरा जवाब था,"सभी प्रणालियां त्रुटि पूर्ण हैं।हमने सभी प्रणालियों की खामियोंसे बचकर मिश्र प्रणाली विश्व को दि हैं,फिरभि सही राजकीय इच्छाशक्ती की अभावके चलते कुछ नहीं हुआ है ।
यह राजनीतिक हताशा एवं'Sick'ularism के बारे में मेरी राय है,हालांकि सदी बदल गई है, कुछ भी नहीं बदला है।कुछसे उम्मीद थी, लेकिन अंत में,सभी मिट्टी के माधव या तेल लगे पहलवान हि सिद्ध हुए।
जब मैं PJ सरको जवाब दे रहा था,उससे कुछ साल पहले,एक युवक जो मुझसे कुछ साल बड़ा था,बैरागी होने के इरादे से विवेका नंद की जीवनी से प्रेरित हो कर हिमालय में भटक रहा था। पर दैवगती ने उन्हे  भारतका प्रधानमंत्री बना दिया।2014 में मोदी के आने के बाद मुझमे आशाकी किरणं जगी, निराशा का स्वर हल्का होने लगा।
उनकी कुंभस्नान की बात,केदारनाथ दर्शन सेवा,काशी उज्जैन,आम जनता के बीच राजनीतिक जागरूकता की चेतना जगाना
(अन्यथा गांधी नेहरूके मूर्खतापूर्ण आचरण, घोटाले,घोटालों के बारे में बात करना एक अपराध होता था,आजभी कुछ राजकीय पिद्दु यही मानते है:अर्णव गोस्वामी एवं पालघर।उनके कुछ साहसिक फैसले,रक्षा, दुनियाभर में भारत की बढ़ती छवि और सिर्फ भारत के विचारकी रुजुवात,अमरीका जाकर व्यवस्थापन / communication स्किल का अध्ययन इन चिजोने  उनके राज कीय उभरन मे आध्यात्मिक विचारॊ एवं संस्कारोंकी  भूमिका के बाबत मुझमे आशा की किरण जगाई ।
गरीब घर में पैदा होने के बाद भी,उन्हेंअपनी माँतासे आध्यात्मिक सिख एवं संस्कार मिले (आज भी,हीराबेन,उनकी माताजीके कमरे में उनके आध्यात्मिक गुरु की एक तस्वीर है)।
मई १९९७ May के अंतिम सप्ताह में,३० और ३१ मई को,मेरे पहले केदारनाथ दर्शन होने के बाद यह सेवा दर्शन आज तक भोले बाबा द्वारा किया जा रहा है,आज 23 सालमे 38 बार यह सेवा भोलेने करवाली है  ।
(गरुड़चट्टी में एक संत रामानंद सेवाश्रम है और एक विशाल प्राकृतिक गुफा है: हनुमान गुफा.अब 2013 की आपदाके बाद चट्टी अलग हो गई है)
इस गुफा की खोज संत श्री अभिरामदासजी (त्यागी)ने 70 के दशक में की,तद उपरांत इस क्षेत्र में श्री संत रामानंद सेवाश्रम का निर्माण किया और वे मई से अक्टूबर के बीच हमेशा और  कभी कभार केदारनाथ धाम के बंद होने के बाद भी कई वर्षों तक वहाँ साधना किया करते थे।श्री पुजारीजी 1974 से 2012 तक यहा यक्ष आदेश के अनुसार रहे है यह पिछले लेखांक मे हमने देख था।(Ref: https: //m.facebook. com/story.php? Story_fbid =350 1427451606240 & id =1000001 70606055
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अतः इस पहली केदार यात्रा में केदारदर्शन उपरांत,मैं मेरे सभी 22 शिलेदारो के साथ गरुड़ चट्टी जाकर अभिरामदासजी से साक्षात्कार किया।
उन्होंने हमें प्रबुद्ध किया,हमें उपदेश दिया, कई सवालों के जवाब दिए। मुझे स्पष्ट रूप से वह समय याद है,जब वोह सात कैलास के बारे में बोलने लगे,मुझे लगा  कि मुझे आदेशही दे रहे है।मैंने सात कैलास और अष्ट नारायण के बारे में जानकारी उनही से सुनी, वह बस मुझे देख कर बात कर रहे थे। उसी समय मेरे मनमे सात कैलास दर्शनकी चाहत जगी। सालों की तैयारी के बाद,मैंने एक-एक करके कैलास करना शुरू किया,क्योंकि इस के बारे में कहीं भी कोई जानकारी नहीं थी, विचरण विवरण नही था। मैं 11 साल  बाद कैलास करने के लिए तैयार हो गया। इसबारे मैं कहीऔर सही जगह लिखुंगा ।
हर केदार दर्शन के दौरमें उनके सत्संकी लालसा हेतू मुझे गरुड़चट्टी रुककर जानेकी  आदतसी हो गयी,अगर वहा नही  मिलते थे, तो ऋषिकेश उनके आश्रम में उनकी सतसंगं और दर्शन सेवा कर लेते थे। गरुड़ चट्टी मेभी पुजारिजिके के करीबी बन गए, जैसा कि उनके बारे मैने उनपे लिखे हुए अपने लेख में लिखा गया है।
अभिरामदासजी,जिन्हें बडे महाराजजी के नाम से भी जाना जाता है,सात सौ साल पहले स्वामी रामनंद द्वारा स्थापित "श्री" संप्रदाय से जुड़े थे। स्वामी रामानंद रामानुज चार्य के शिष्य एवं अनुयायी तथा विशेष अद्वैत या अनन्य द्वैत  सिद्धांत के अनुयायी थे।
बडेमहाराज अभिरामदासजी 'श्री' संप्रदायसे संबंधित हैं।इस संप्रदाय की स्थापना स्वामी रामानंद ने सात सौ साल पहले की थी। स्वामी रामानंद रामानुजाचार्य सप्रदायके अनु यायी थे।यह "श्री "सिद्धांत श्री रामानुजाचार्य द्वारा प्रस्थापित किया गया है, जो 10 वीं शताब्दी में तमिलनाडु में पैदा हुए थे। उनकी राजधानी तमिलनाडु में नंगनेरी है,जो एक अष्टनारायण स्थान है।
रामानुजी लक्ष्मीनारायण उपासक हैं,लेकिन इसके बिना, रामानुज संप्रदाय के अनुयायी,  द्वारा 13 वीं शताब्दी में एक नए उपसंप्रदाय की स्थापना की गई थी। श्री“सम्प्रदाय इस सम्प्रदाय के संत केवल बैरागी होते हैं और वैरागी सिंहासन पर बैठते हैं।
(रामानुजी में, गृहस्थ भी संत  होते हैं और गद्दी पर बैठ सकते हैं।) इस "श्री" संप्रदाय के लक्ष्मी नारायण के बजाय, सीताराम देवता हैं और वे ही हैं जो उनकी पूजा करते हैं।
अभिरानदासजी इस श्री सम्प्रदाय, रामानंद सम्प्रदाय से जुड़े हुए हैं। वे एक उच्च कोटि के ऋषि हैं,उनकी आवाज़ मधुर,मधुरभाषी और सदाबहार है। ।
कम उम्र में, नरेंद्र मोदी आत्म-साक्षात्कार की तलाश में अकेले एकांत दृष्टिकोण में अपने परिवार के गुरु श्री अभिरामदासजी के पास केदारनाथ गरुड़चट्टी पहुंचे।
नरेंद्र हिमालय में लगभग दो से तीन साल तक रहे थे, मुख्यतः गरुड़चट्टी और बाद में बद्रीनाथ में।
उनका मन वैराग्यपूर्ण हो गया, जिसकारण उन्होन्हें संन्यास लेने का फैसला किया।यही फैसला  उनके जीवनकी दौड जा turning point साबीत हुआ
दैवगती कुछ और हि थी......कैसे?.देखते है आगे......

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